बुधवार, 11 नवंबर 2015

अभिव्यक्ति की आज़ादी और शोषण होते आम जन की झलकियाँ

 ८ नवम्बर२०१५ वह ऐतिहासिक दिन जब बिहार की राजधानी पटना में चुनाव परिणाम के आने की तपिश से पूरा देश प्रभावित हो रहा था तो पटना रंगमंच के रंगकर्मी अपनी सहजता और कुशलता के साथ झारखण्ड की राजधानी रांची में अपने जलवे बिखेर रही थी। 
झारखण्ड की राजधानी रांची जो कभी एशिया का सबसे बड़ा पागलखाना के रूप से भी जाना जाता था जिसके कुछ पागल रंगकर्मीं आज भी नाटकों के अलख को जगाने के लये प्रत्येक रविवार नाटक कार्यक्रम करते है जो पूर्णत; निशुल्क और बिना किसी सरकारी सहयोग के होता आ रहा है , ५  अप्रैल२०१५ से आरम्भ हुए इस कार्यक्रम में ढेरो नाटकोंके मंचन हो चूका है इसी कड़ी में पटना के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति हे मातृभूमि नाटक का मंचन कान्तिकृष्ण कला भवन , गोरख नाथ लेन ,अपर बाजार रांची में किया.  
  अभिव्यक्ति की आज़ादी और शोषण होते आम जन, नाटक "हे  मातृभूमि" इनके इर्द गिर्द सिर्फ घूमता ही नहीं बल्कि वर्तमान व्यवस्था


की झलकियाँ भी दिखता गया।
नाटक में निर्देशक ने जो दिखाना चाहा और उनकी सभी चाह  को रांची के दर्शकों ने अपने अंदर आत्मसात किया।
नाटक का आरम्भ किसी ऐसे प्रेक्षागृह से होती है जहां चंद्राकार जो एक पत्रकार और रंगकर्मी है जिसके नाटक का मंचन होने वाला है परन्तु चंद्राकर समय से नहीं पहुँचता ना ही कोई सुचना है तभी पता चलता है की चंद्राकर की गोली मार हत्या कर दी गई है , ये वही चंद्राकर है जिसकी खोजी पत्रकारिता और कर्मठता ऐसे सफेदपोशो के लिए सरदर्द है जो देश दुश्मन है पर समाज में उनकी प्रतिष्ठा है , यूरेनियम की चोरी छिपे कारोबार करने वालो का पर्दाफाश चंद्राकर करता है जिसे रुपयों की लालच दे मामला को दबाने के लिए कारोबारी चंद्राकर को खरीदना चाहते है परन्तु चंद्राकर बिकता नहीं तो उसकी हत्या कर दी जाती है।
नाटक में निर्देशक सनत कुमार ने कई निर्देशकीय प्रयोग किये जो नाटक की गति को स्पीड बढ़ाते रहे और नाटक के अंत में कलाकारों को श्रदांजलि के साथ अपने कर्मठता का अहसास करा गए।
नाटक का मंचन रंगसृष्टि ,पटना के द्वारा की गई जिसमें अभिनय किया सनत कुमार ,धीरज कुमार, नंदन कुमार, अरुण कुमार , रवि कुमार , अभिषेक कुमार ने तथा प्रकाश एव मंच व्यवस्था थी रवि कुमार एव राज कपूर की     

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